आरबीआई ने 10,000 रुपये से अधिक के लेनदेन

डिजिटल भुगतान धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों पर लगाम लगाने के लिए, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ₹10,000 से अधिक के सभी ऑनलाइन ट्रांजैक्शन पर एक घंटे की अनिवार्य देरी का प्रस्ताव दिया है। गुरुवार को जारी एक चर्चा पत्र (Discussion Paper) में केंद्रीय बैंक ने इस “कूलिंग-ऑफ पीरियड” का सुझाव दिया है, ताकि यदि किसी ग्राहक के साथ धोखाधड़ी हो रही हो, तो वह उस दौरान ट्रांजैक्शन को रद्द कर सके।

यह कदम विशेष रूप से ‘ऑथराइज्ड पुश पेमेंट’ (APP) धोखाधड़ी को लक्षित करता है, जहाँ जालसाज लोगों को डरा-धमकाकर या लालच देकर खुद पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करते हैं।

प्रणाली: जालसाजों के खिलाफ एक ‘फायरवॉल’

प्रस्ताव के अनुसार, यदि कोई ग्राहक ₹10,000 से अधिक का भुगतान शुरू करता है, तो राशि उसके खाते से अस्थायी रूप से कट (Debit) जाएगी, लेकिन प्राप्तकर्ता के खाते में 60 मिनट बाद ही जमा (Credit) होगी। इस एक घंटे के दौरान, भेजने वाले के पास ट्रांजैक्शन को “किल स्विच” या बैंक ऐप के जरिए रोकने का विकल्प होगा।

बैंकिंग विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकांश पीड़ितों को धोखाधड़ी का अहसास पहले 30 मिनट के भीतर हो जाता है। यह समय सीमा उन्हें अपनी गाढ़ी कमाई बचाने का एक मौका प्रदान करेगी।

बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए अतिरिक्त सुरक्षा

धोखाधड़ी के प्रति संवेदनशील समूहों की सुरक्षा के लिए, आरबीआई ने ₹50,000 से अधिक के लेनदेन के लिए “विश्वस्त व्यक्ति प्रमाणीकरण” (Trusted Person Authentication) का सुझाव दिया है। इसके तहत, वरिष्ठ नागरिकों या दिव्यांग व्यक्तियों द्वारा किए जाने वाले बड़े भुगतान के लिए उनके द्वारा नामांकित किसी भरोसेमंद व्यक्ति (जैसे परिवार का सदस्य) की मंजूरी अनिवार्य हो सकती है।

‘म्यूल अकाउंट्स’ पर नकेल

जालसाज अक्सर चोरी के पैसे को छिपाने के लिए “म्यूल अकाउंट्स” (दूसरों के नाम पर खोले गए खाते) का उपयोग करते हैं। आरबीआई ने ऐसे खातों में वार्षिक क्रेडिट की सीमा ₹25 लाख तय करने का प्रस्ताव दिया है। यदि किसी खाते में बिना अतिरिक्त जांच के इससे अधिक राशि आती है, तो उस खाते की गहन जांच की जाएगी। इसके लिए आरबीआई ने “MuleHunter.AI” नामक एआई टूल भी पेश किया है, जो वर्तमान में 26 बैंकों में लाइव है।

धोखाधड़ी का बदलता स्वरूप

नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) के आंकड़े बताते हैं कि 2025 में लगभग 28 लाख साइबर धोखाधड़ी के मामले दर्ज किए गए, जिनमें कुल ₹22,931 करोड़ की चपत लगी। आरबीआई ने स्पष्ट किया कि अब धोखाधड़ी सिस्टम में सेंध लगाकर नहीं, बल्कि ‘सोशल इंजीनियरिंग’ (जैसे फर्जी कॉल, डराना या डीपफेक वीडियो) के जरिए की जा रही है।

आरबीआई ने इन प्रस्तावों पर जनता और हितधारकों से 8 मई 2026 तक प्रतिक्रिया मांगी है। इन नियमों के लागू होने से भारत के डिजिटल भुगतान परिदृश्य में सुरक्षा और विश्वास का एक नया अध्याय शुरू होने की उम्मीद है।

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